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रविवार, 15 अक्तूबर 2017

बड़ी ख़ुशी या छोटी-छोटी ख़ुशियाँ

कहते हैं कि मानव-जीवन एक बार ही मिलता है। इस जीवन को सुखमय जीना ही मानव का लक्ष्य होना चाहिये। अतः जीवन में सुख बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है। यह जीवन वैसे तो देखने में बड़ा लम्बा प्रतीत होता है, किन्तु अंतिम समय अनुभव होता है कि जीवन कितना छोटा था। इस छोटे-से जीवन को ख़ुशियों के साथ जीने में कठिनाई नहीं होनी चाहिये थी, किन्तु ऐसा नहीं हो पाता है। सभी एक समय ऐसा अनुभव करते हैं कि उनका जीवन सुख से बीत न सका और तब वे अपने भाग्य को कोसते रहते हैं या फिर अपने किये पर पछताते रहते हैं। इसका एक प्रत्यक्ष कारण जो स्पष्ट दिखाई देता है, वह है कि हम एक बड़ी ख़ुशी को प्राप्त करने के प्रयास सभी छोटी-छोटी ख़ुशियों का त्याग कर देते हैं। जब वह बड़ी ख़ुशी भी न मिल पाती है, तो जीवन दुःखों का पहाड़-सा दिखाई पड़ता है।

जीवन को सुखमय जीने का मूलमंत्र होता है कि जीवन को सरलता से जीना चाहिये। सरल जीवन में प्रत्येक स्थल पर अनेक प्रकार की छोटी-छोटी ख़ुशियाँ प्राप्त होती रहती हैं और उन्हें अपना कर अपने जीवन को आगे बढ़ाना चाहिये। बहुधा होता है कि अधिक पाने की चाह में इन छोटी-छोटी ख़ुशियों को हम महत्त्व नहीं देते हैं और जीवन को कठिन बनाते हुए एक या दो बड़ी ख़ुशी की तमन्ना कर बैठते हैं, जिन्हें प्राप्त करने की कोई गारंटी नहीं होती। फिर भी हमारी आशा यही रहती है कि वे प्राप्त हों और तदनुसार हम उपक्रम भी करने लगते हैं। जी-जान लगाकर हम उसे प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। कितनी भी परेशानियाँ उठानी पड़े, हम उठाते जाते हैं। सभी सुख त्याग देते हैं और तब हम समस्त प्रकार के सुखों से हम वंचित रह जाते है। कभी किसी को वह बड़ी ख़ुशी मिल भी जाती है, किन्तु बहुधा देखा गया है कि अधिकांश लोग इससे वंचित रह जाते हैं। 


यह अवश्य है कि जो लोग जीवन के मार्ग में सभी छोटी-बड़ी ख़ुशियों को अपनाकर चलते हैं, उनका जीवन हमेशा ही सुखमय रहता है। उन्हें कभी भी कठिनाइयों के अनुभव नहीं होते हैं। अतः हमें विचार करना होगा कि क्या एक बड़ी का प्रत्याशा में जीवन को कठिन बनायें अथवा हर छोटी-बड़ी ख़ुशी को अपनाकर अपने जीवन को सरल बनाकर स्वयं को हमेशा के लिये ख़ुश रखें? यह मात्र संदेश नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका भी है।


    जब हम ख़ुशियों की बात करते हैं, तब हमें यह भी सोचना होगा कि यह ख़ुशी क्या है? विचारों को समझना और विचारों को समझकर समझना अलग बातें होती हैं। उसी प्रकार ख़ुशी को समझना भी अलग बात होती है। क्या जिसे हम ख़ुशी मान रहे हैं वह ख़ुशी है? पाकिस्तान या भारत जब मैच जीतता है, तो लोग ख़ुशियाँ मनाते हैं, तो क्या यह वास्तविक ख़ुशी है अथवा पुष्पों को देखकर जो मन में आनंद आता है, वह ख़ुशी है। विचार करना आवश्यक होगा। क्षणिक आवेग को ख़ुशी कहना होगा अथवा स्थायी मन के अह्लाद को।


छोटी-बड़ी ख़ुशियों की बातें करना सरल है, किन्तु उत्तर बड़ा कठिन। सभी कहते हैं कि ख़ुशी का कोई पैमाना नहीं होता। यह अलग-अलग व्यक्ति में अलग-अलग प्रकार से अपना घर बनाती है। कोई व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में ख़ुश होता है, जबकि किसी को बड़ी बातों में भी कोई ख़ुशी दृष्टिगत नहीं होती, तो क्या यह व्यक्तिगत है? कुछ हद तब इसका उत्तर हाँ में ही होगा। इस बात से किसी को इंकार न होगा कि ख़ुशी एक भाव है - मन का भाव। मन ही उसका अनुभव करता है और शेष सभी प्रक्रियायें जैसे हाव-भाव, मुस्कान आदि बाह्यतः प्रदर्शित होती हैं। यह अनुभव कुछ करने से, कुछ प्राप्त करने से, कुछ कहने-सुनने आदि से प्राप्त होते रहते हैं। समझना इस बात को है कि क्या प्रत्येक कृत्य में सुख का अंश है? हाँ है, भोजन करते समय भी सुख या दुःख का अनुभव किया जा सकता है। चलते समय भी इसका अनुभव किया जा सकता है। हँसना या रोना तो कार्य है, किन्तु यह कार्य करने की प्रेरणा वे भाव हैं, जो सुख या दुःख अनुभव कराते हैं। प्रत्येक स्थिति में सुख का अनुभव करने वाला ही मानव-जीवन के लक्ष्य को जीता है और उस अंतिम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। दुःख का कारण अनेक दिखाई देता है, किन्तु वास्तव में एक ही कारण है, सुख का अनुभव न करना। 


जो मानव जीवन की हर छोटी-बड़ी ख़ुशी को अपनाकर चलता है, वही सुखी रहता है। इस बात से किसी को इंकार न होगा। यह जीवन का एक वास्तविक सच है, जिसे अपनाकर हम स्वयं को सुख का भागी बना सकते हैं। प्रत्येक छोटी-छोटी बात पर हम बुरा मान जाते हैं, क्योंकि हमें अपनी छोटी सोच से बचने का उपाय नहीं आता या हम ऐसा करना नहीं चाहते। जीवन सरिता की भाँति है, जो सतत प्रवाहमान है। उसे मार्ग में पड़ी छोटी-छोटी बाधायें रोकती नहीं, टोकती नहीं। हम स्वयं को रोक देते हैं, टोक देते हैं और इस प्रकार दुःख को अपना लेते हैं। मन की गठरी को खोल यदि जीवन को अपनाया जाये, तो मात्र सुख का अनुभव दूर नहीं, किन्तु हमारा प्रयास दुःख को आलिंगन करने का अधिक होता है, क्योंकि हम छलावे में रहना अधिक पसंद करते हैं। बहुधा देखा गया है कि हम सुख पाने का यत्न अत्यधिक करते हैं और अपना जीवन भी उसमें झोंक देते हैं, किन्तु कभी भी सुख का अनुभव करने का यत्न नहीं करते और इसी कारण सुख से दूरी ज्यों की त्यों बनी रहती है।


आत्मा का स्वभाव है आनन्द की प्राप्ति। यही बात समझ नहीं आती। जिसने समझ लिया, वह लक्ष्य भेद लेता है, अन्यथा जीवन भर दुःख को ढोना ही नियति बन जाती है। 


दुःख का अनुभव हम क्यों करते हैं? कल विदेश में किसी के रिश्तेदार का निधन हो गया। उस व्यक्ति का पता नहीं चला। उसे दुःख का अनुभव नहीं हुआ, किन्तु उसके जीवन में वह दुःख आया अवश्य। फिर आज उसे पता चला, तो उसे दुःख हुआ। जीवन यही है, यदि हम किसी घटना आदि को जानकर दुःख करते हैं, तो हमें सोचना होगा कि उस दुःख के ठीक पहले मेरी क्या अवस्था थी? क्या तब मैं ख़ुश था या दुःखी? यदि ख़ुश था तो मैं उसी अवस्था में जा सकता हूँ? यदि प्रयास करें, तो हम अवश्य जा सकते हैं। दुःख मानसिक है, दर्द भी मानसिक है। हम देखते हैं कि पेट में दर्द हो रहा है और तभी कोई बड़ा अच्छा मित्र आ जाता है। हम उनसे बातें करने लगते हैं और दर्द कम हो जाता है। हम कुछ ऐसा काम करने लगते हैं, जो बड़ा प्रिय है और दर्द गायब हो जाता है। अनुभव करने पर दुःख होता है, दर्द होता है। 


जीवन को सरलता से जीना जीवन-लक्ष्य है। जितनी कठिनाइयों को हम अपनायेंगे, उतने ही दुःख हमारे पास आयेंगे। सरल और शुद्ध जीवन से न केवल हम समस्त प्रकार के सुखों के अनुभव कर पायेंगे, बल्कि दूसरों के सुख में भी सम्मिलित हो पायेंगे। यदि आधार ऐसा बने तो जीवन-लक्ष्य असंभव नहीं। जीवन का आधार यदि सरलता में हो, तो जीवन निरन्तर सुखमय होगा। 


सुख कहते किसे हैं? क्या किसी से दो पल बातें कर लेना सुख है? कुछ खा-पी लेना सुख है। मौज-मस्ती कर लेना सुख है? कोई सफलता मिल जाना सुख है? यह बात हम सभी को समझना होगा कि सुख क्या है? जिस दिन हमें सुख की परिभाषा मिल जायेगी, उस दिन से सुख की तलाश भी बंद हो जायेगी। सुख एक सकारात्मक स्थिति है, एक अनुभव है, एक मनोदशा है, एक भावना है। यदि हम मन को सकारात्मक रखना सीख गये, तो सुख का अनुभव निरन्तर होता रहता है। अहंकार या नकारात्क सोच इसमें सबसे बड़ी बाधा होती है।
अहंकार, कुछ बनने की इच्छा, कुछ पाने की इच्छा, दूसरे के सुख को देखना, वर्तमान में न जीना, मोह का होना आदि अनेक ऐसे कारण हैं, जो दुःख को बुलावा देते हैं। इनसे बचने के उपाय के साथ एक सकारात्मक सोच को हावी होने देना ही सुख का कारण बन सकता है। 


हर व्यक्ति की अपनी सोच और समझ होती है। हमें वो ग्रहण करना होता है, जो उचित है। यह भी एक बड़ी सीख है, यदि हम अपने जीवन में उतार लें, तो जीवन सरल हो जायेगा और यदि जीवन सरल हुआ, तो वह सुखमय भी हो जायेगा।


विश्वजीत ‘सपन’

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

आभासी दुनिया और साहित्य

यह बात सही है कि आभासी दुनिया ने अनेक लोगों को अभिव्यक्ति का एक आसान साधन प्रदान किया है। आज हमें किसी प्रकाशक की आवश्यकता का अनुभव नहीं होता है। हम अपनी मर्जी से कुछ भी प्रकाशित कर सकते हैं। हमें सैकड़ों पाठक मिल जाते हैं, बिना किसी मेहनत के और संतुष्टि भी मिलती है। यह एक क्रान्तिकारी परिवर्तन है और इस युग की एक बड़ी उपलब्धि भी है। इसने सही मायने में स्थानीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में महती भूमिका निभाई है। 

देखना यह होगा कि इसके केवल सकारात्मक पक्ष ही नहीं हैं, बल्कि अनेक नकारात्मक पक्ष भी हैं। जहाँ एक ओर यह हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देती है, वहीं दूसरी ओर अनाप-शनाप लिखने को भी प्रेरित करती है। एक बात जो यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण है, वह है मौलिकता की। साथ ही दूसरी बात भी बहुत प्रासंगिक है और वह है प्रामाणिकता की। आभासी दुनिया के साहित्य में मौलिकता और प्रामाणिकता का अभाव साहित्य को लाभ देने के बजाय उसे बहुत हानि पहुँचा रहा है, जो विचारणीय है और आने वाले समय में सोचनीय भी। 


इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज कुकुरमुत्तों की भाँति बढ़ती साहित्यकारों, कवियों, लेखकों की नयी पौध ने ‘‘अधजल गगरी छलकत जाये’’ की भाँति अधकचरे ज्ञान को बिना प्रामाणिकता के आभासी दुनिया का हिस्सा बनाया है, जिसे लोग सच मानने पर विवश हो रहे हैं। यह साहित्य के लिये और उसके उचित प्रचार-प्रसार के लिये न केवल एक बड़ा ख़तरा है, बल्कि एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अनधिकार लेखन, बिना कारण की अभिव्यक्तियाँ और उन पर बेकार की वाहवाहियाँ, स्वयं को बड़ा साहित्यकार कहलवाने की ललक, साहित्यकार बन जाने का दम्भ, प्रकाशकों की भरमार और लुभावने प्रस्ताव आदि न जाने ऐसे अनेक कारण हैं, जो उचित, सामाजिक एवं सांस्कृतिक साहित्य के लिये एक बड़ी समस्या के रूप में उभरकर सामने आ रहे हैं। हमें सोचने पर विवश कर रहे हैं कि ऐसे साहित्य से साहित्य का क्या भविष्य होगा?


सीखने और सिखाने का दौर भी चला है, जो स्वागतेय है। अनेक लोग हैं और मंच हैं, जिन पर यह दौर चल रहा है। अनेक ब्लॉग और वेबसाइट हैं, जहाँ सार्थक चर्चायें भी हो रही हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम सीखने की ललक रखते हैं अथवा मात्र लिखने में विश्वास रखते हैं कि हमसे अच्छा कोई नहीं लिख सकता। तो इस प्रकार आभासी दुनिया का साहित्य समारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव डाल रहा है। आवश्यकता है कि हम इसके समारात्मक प्रभाव को अपनी झोली में डालें और नकारात्मक को दूर करने का प्रयास करें। 


यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है कि हमें सार-सार का ग्रहण करना है और कचरा फेंकना भी है। इस आभासी दुनिया के लिये यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बिन्दु है, जिसे हम सभी को समझना होगा। बिना परखे किसी भी तथ्य को नहीं स्वीकारना ही उचित है।


यह चिंता भी जायज है कि जब से फेसबुक नामक चिड़िया का जन्म हुआ है, लोग धड़ाधड़ कुछ लिखने को उतारु हैं। बिना सोचे-विचारे कि कुछ तथ्य-कथ्य भी रचना में है अथवा नहीं। वे प्रतिदिन कुछ न कुछ लिखकर डालना चाहते हैं और बिना पढ़े ही वाहवाही देने वालों से प्रसन्न होते हैं। यह चिंताजनक है। सही बात तो यह है कि साहित्य साधना है। यह खेल-खेल में कुछ अभिव्यक्त करने का साधन न कभी था और न कभी रहेगा। साहित्य जब उद्देश्य-विहीन हो जाये, तो वह साहित्य नहीं होता। 


इसमें कोई संदेह नहीं कि आभासी दुनिया एक क्रान्तिकारी क़दम है। इसके सकारात्मक योगदान को देखना होगा और नकारात्मकता को नकारना होगा, उसे सही दिशा में मोड़ना होगा। तभी हम इससे अधिकाधिक लाभान्वित हो सकते हैं।


विश्वजीत 'सपन'